उत्तराखंड

अंतिम बार 17 वर्ष पूर्व रुड़की आये थे पद्मश्री डॉ. श्याम सिंह शशि

रुड़की : विश्व स्तर पर नृविज्ञानी या एंथ्रोपोलॉजिस्ट के रूप में पहचान बनाने वाले , एक एन्साइक्लोपीडिया के संपादक , हिंदी और अंग्रेजी में लगभग 300 पुस्तकों के लेखक , दोनों भाषाओं में समान लेखन के लिए पद्मश्री सम्मानित डॉ. श्याम सिंह शशि को अपने ही जन्म क्षेत्र में भुला दिया जाना दुःख का विषय है। हम यदि वैश्विक स्तर पर ज्ञान पताका लहराने वाले विद्वानों को विस्मृत कर रहे हैं, तो यह समाज के संदर्भ में गंभीर पुनर्विचार का समय है। ये विचार साहित्यकार प्रोफेसर डॉ. सम्राट् सुधा ने पद्मश्री साहित्यकार डॉ. श्याम सिंह शशि की प्रथम पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर एक बातचीत में व्यक्त किये ।

डॉ. शशि का गत वर्ष 19 फरवरी को नयी दिल्ली में देहावसान हो गया था। डॉ. सम्राट् सुधा ने बताया कि डॉ. श्याम सिंह शशि का जन्म 1 जुलाई, 1935 को हरिद्वार के निकट के ग्राम बहादुरपुर जट्ट में हुआ था। एक अत्यंत निर्धन परिवार से निकलकर अपने परिश्रम के बल से वे भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत प्रकाशन विभाग के महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए और दिल्ली में ही बस गये। उन्होंने रुड़की के बी. एस. एम. पी.जी. कॉलेज से अपनी स्नातक की शिक्षा वर्ष 1960 में ग्रहण की थी।

डॉ. सम्राट् सुधा ने बताया कि डॉ. श्याम सिंह शशि अंतिम बार रुड़की में अपने पूर्व कॉलेज के हिंदी विभाग के राष्ट्रीय सेमिनार में 25 सितंबर,2009 को आये थे, इससे पूर्व उन्हें अनेक बार रुड़की के साहित्यिक कार्यक्रमों में बुलाया गया, लेकिन समय के साथ क्षेत्र के लोग उन्हें भूलते गये, पुरानी पीढ़ी गुज़रती रही और नयी के पास अपने साहित्यिक व्यक्तित्वों को पढ़ने या उनसे भेंट करने का समय ही नहीं रहा। उन्होंने कहा कि विचार किया जाना चाहिए कि पिछले 17 वर्षों ने नगर की स्वनाम धन्य साहित्यिक संस्थाएं और विद्यालय अपने ही क्षेत्र में जन्में एक विश्व प्रसिद्ध विद्वान् को आमंत्रित करने में क्यों चूके।

वर्ष 2004 में 17 फरवरी को वे स्वयं पर प्रकाशित डॉ. सम्राट् सुधा की शोध पुस्तक उत्तर आधुनिकता भूमंडलीकरण तथा शशि काव्य के विमोचन हेतु रुड़की आये थे। डॉ. सम्राट् सुधा का उनसे वर्ष 1990 से उनके जीवनपर्यंत संबंध रहा। उन्होंने डॉ. शशि पर लगभग दो दर्जन लेख लिखे और उनके लिए अनेक साक्षात्कार राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए।  उन्होंने इसे अपना सौभाग्य बताया कि सहारनपुर के एक साहित्यिक कार्यक्रम से डॉ. शशि एकाएक केवल उनके लगभग एक वर्षीय पुत्र शिवज्ञ शर्मा से मिलने रुड़की आये और उसे देर तक अपनी गोद में खिलाया।

ये क्षण आजीवन स्मृति में रहने वाले हैं और इस बात का प्रमाण है कि वैश्विक स्तर का एक विद्वान् कितना संवेदनशील भी होता है। डॉ. सम्राट् सुधा ने कहा कि भारत में उत्तर आधुनिकता और भूमंडलीकरण की जो अवधारणाएं बीसवीं सदी के अंतिम दशक में विचार का विषय थीं, उन दोनों अवधारणाओं के तत्त्व डॉ. श्याम सिंह शशि द्वारा बीसवीं सदी के छठें ,सातवें और आठवें दशक में रचित काव्य में प्रमुखता से सम्मिलित थे। उनका महाकाव्य अग्निसार अनेक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल रहा तथा संगोष्ठियों में वे एक प्रखर वक्ता के रूप में अपनी पहचान रखते थे।

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